भक्त चुन्नी लाल टाक

अदभुत व्यक्तित्व का जीवन परिचय
एक अनूठा व्यक्तित्व “सर्वभूत हितैरता :-”
एक गृहस्थ सन्यासी, उच्च राजपत्रित पदों पर आसीन होते हुए भी सम्पूर्ण कामनाओं का परित्याग कर, आधाशक्तिः जगद्जननी माँ भगवती दुर्गा की आराधना में सर्वभावेन् समर्पित व्यक्तित्व, गौभक्त, भरे पूरे परिवार के मोह से निवृत्त हो सर्व समाज की पीड़ा हरने हेतु जीवन समर्पित, एक निर्जन, अस्त व्यस्त स्थान पर बाड़ी माता को एक भव्य स्थल में रूपान्तरित कर उसके वैभव को सर्वत्र प्रसारित करने में अनोखा प्रयास निष्काम, कर्मठ, त्यागमय जीवन, कठोर श्रम बिन्दुओं से सींचकर कुसुमित पल्लवित करने का प्रण सेवाभावी सरल, मृदुल स्वभाव, सादगी पूर्ण जीवन का श्रेष्ठ उदाहरण- ऐसे महामानव का जन्म सीकर जिले का नेछवा गांव में कार्तिक सुदी चवदस सम्वत् 1992 दि. 9 नवम्बर 1935 में गुरुदेव का जन्म हुआ । इनकी माता का नाम श्रीमती राधादेवी पिता श्री रूपचन्द थे । इनकी पत्नी श्रीमती सावित्री एवं दो पुत्र व दो पुत्रियां है ।
बचपन से ही पढ़ने मे होशियार, कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। जब वे कक्षा 3 मेंपढ़ते थे तो उनके गुरुजी श्री सीताराम जी जोशी ने उनकी हस्त लेखनी एवं अंग्रेजी भाषा में कक्षा पाँच के विद्यार्थी को टेन्स पढ़ाते देखकर सीधा कक्षा तीन से कक्षा पाँच में बैठने की अनुमति दे दी ।
अनुमति उनकी हस्त लेखनी इतनी सुन्दर थी कि पूर्व उपराष्ट्रपति स्व. श्री भैरूसिंहजी शेखावत जो कि उस समय में इस नेछवा (सीकर) गांव में पुलिस विभाग में मुंशी के पद पर कार्यरत थे। थाने में बुलवाकर हस्त लेखनी सम्बन्धित प्रश्नावली का कार्य कराया करते थे। हायर सैकण्डरी परीक्षा एस. के. कॉलेज सीकर से उत्तीर्ण करने के पश्चात् शिक्षक पद पर शिक्षा विभाग से जुड़ गये । शिक्षा विभाग में रहते हुए उन्होने लोसल,दांता, पलसाना, खूड, बानुड़ा, कांवट, श्रीमाधोपुर, रीगंस (सीकर ) में द्वितीय वेतन श्रृंखला में अपनी सेवाएँ दी ।
शिक्षा विभाग में रहते हुए भी अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाया और बी.कॉम. एवं बी. एड. की डिग्री हासिल की। फुलिया कलां भीलवाड़ा में स्थानान्तरण होने पर इन्होंने राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) में कॉमर्स व्याख्यता पद के लिये इन्टरव्यू दिया जिसमें उत्तीर्ण हुए। और राजकीय नारायण हायर सैकण्डरी स्कूल बिजयनगर में वाणिज्य व्याख्याता पद पर कार्य भार संभाला ।
जब वे शिक्षा विभाग से सेवारत थे तब वे हमेशा सफेद शर्ट, पेन्ट एवं टाई अक्सर पहना करते थे।
कैसे हुआ माँ से सम्पर्क
1969 में राजकीय हायर सैकण्डरी स्कूल बिजयनगर में वाणिज्य व्याख्याता पद पर सेवारत थे । गुरुदेव श्री भागचन्द सोनी के मकान में किराए पर रहे उन्हे देवी उपासना करते देख उन्होने बाड़ी माता का जिक्र किया कि हमारे यहाँ पर भी देवी माँ का मन्दिर हैयहाँ पर फूल पाती का पर्चा है।
गुरुदेव माँ के स्थान पर भागचन्द सोनी के साथ साइकिल पर आए और साधारण धोक लगाकर पुनः बिजयनगर किराये के मकान में चले गये। कुछ समय पश्चात बाड़ी माता के पूर्व पुजारी श्री लादुरामजी तिवाड़ी को स्वप्न में जाकर कहा कि सीकर जिले का रहने वाला मास्टर चुन्नीलाल टाक बिजयनगर बड़ी स्कूल में है। उससे कहो कि अगर तुझको कोई तकलीफ है तो मेरे यहां आ कर फूल पाती क्यों नही मांग लेता । पूर्व पुजारी स्कूल में अनजान होने के कारण मास्टर जी को ढूंढने लगे जिनसे उन्होने पूछा तब उन्होने कहा कि मैं ही चुन्नीलाल टाक हूँ। सीकर का रहने वाला हूँ क्या आपके बच्चे का दाखिला करवाना है।
उन्होने कहा कि नहीं मुझे बाड़ी माता ने स्वप्न में आपके बारे में आदेश दिया है। वह कहने आया हूँ। जब पूर्व पुजारी ने अपना दृष्टान्त सुनाया तो प्रेरणा जागृत हुई स्कूल अवकाश पश्चात सीधे बाड़ी माता स्थान पर आये और पूछा यह तो छोटा सा मन्दिर है। क्या है इसकी विशेषता ! पूर्व पुजारी ने कहा कि यहाँ फूल पात्ती का पर्चा है। गुरुदेव ने अपना प्रश्न अंग्रेजी भाषा में लिखा और माँ को पहुँचा दिया। पुजारी जी पाती लेकर आये और कहा की आपकी पात्ती आ गई है। गुरुदेव ने पात्ती देखी ओर उसमे ना का उत्तर मिलने पर व्याकुल हो गये।
कार्य सिद्ध न होने पर गुस्सा आना स्वभाविक था। उसी दिन रात्रि में बाड़ी माता चिन्मय रूप में वहाँ जहा गुरुदेव किराए के मकान में रहते थे गई और स्वप्न में आकर कहा कि “बेटा तुने मुझे अंग्रेजी पढ़ाई या मैने” बस उसी दिन से माँ के प्रति आस्था उमड़ पड़ी और माँ के दरबार में आना चालु हो गया।
20 दिसम्बर 1970 को अपने आवास पर नवरात्रि के समय जहा नवरात्रि पूजा का पाट सजा रखा था वही सो रहे थे वे तभी प्रत्यक्ष रूप से प्रातः चार बजे दरवाजा खोला और माँ भगवती बाड़ी माता सुक्ष्म रूप से पार्थिव शरीर को छोड़कर आत्मिक रूप से गुरुदेव को अपने निज मन्दिर के सामने बुलाकर पटक दिया। बस तभी से गुरुदेव माँ के इस कलाल रूपी जाति मे जन्म लेते हुए भी “माँ के लाल” बन गए।
माँ ने उन्हें साक्षात् बाल भक्त के रूप में स्थान दिया एवं गुरुदेव की अथक,अदम्य, उत्साह, साधना में तल्लीन हो कर माँ की पाती आदेशानुसार माँ के मुख्य सेवक बन गए। जो छोटा सा बाड़ी माता मन्दिर था वह बाड़ी धाम बन गया।
जीवन का मोड
हमेशा पेन्ट, शर्ट, टाई पहनने वाले पाँव में जूते धारण करने वाले शिक्षक टाक साहब कहलाने वाले इस मानव जीवन में सांसारिक लोकेक्षणा का जीवन जीने वाले मानस में अचानक मोड़ आया कि सन् 1970 से उन्होने अपना भारतीय वस्त्र धोती-कुर्त्ता पहनना शुरू कर दिया। एवं माँ की उपासना हर समय चलती रहे इस हेतु बूट- शूट का त्याग हमेशा-हमेशा के लिए कर दिया। सांसारिक जीवन से विरक्त हो कर सुख- सुविधाएँ तथा रेडियो सुनने के शौकीन, हाथ में घड़ी व अंगूठी धारण करने का शौक त्याग कर माँ को अर्पित कर अपना जीवन ही माँ को सोंप दिया ।
योग क्रिया
बचपन से ही गुरुदेव को एक योग्य गुरु श्री सीताराम जी जोशी का सानिध्य मिला और प्रणायाम एवं योग साधना युवा अवस्था से ही प्रारम्भ कर दी । वे प्रतिदिन मयूरासन, कुकरासन, धनुरासन, फॉग आसन, श्वासन, सूर्य नमस्कार, सिरशासन, समाधि, प्रणायाम किया करते थे।
गुरुदेव ने अपने जीवन में खान-पान का विशेष महत्त्व रखा । गाय का दूध, दही व घी का प्रयोग करते एवं तामसिक भोजन से परहेज रखा । नियमित समय पर भोजन एवं रात्रि ठीक 10 बजे कितना भी न्यान्त कार्यक्रम हो शयन करना एवं पुनः प्रातः ब्रह्म मुहर्त में उठकर जंगल में नंगे पैर जाकर शोच क्रिया आदि से निवृत होते ।
गुरुदेव का भक्ति संस्मरण द्रष्टिकोण
राजकीय विद्यालय बिजयनगर में वाणिज्य व्याख्याता होते हुए खाली कालांश में सिर्फ बाड़ी माताजी मन्दिर उन्नयन, चमत्कार, फूल-पात्ती, दृष्टांत आदेश की चर्चा अपने साथी श्री अमरसिंहजी चौहान (अंग्रेजी) एवं पण्डित लादूराम शर्मा कर्मवीर संस्कृत अध्यापक से सदा चर्चालीन रहा करते थे । विद्यालय प्रवेश द्वार पर साष्टांग लेट कर (कपड़े गंदे न होने का ध्यान न रखकर) विद्यालय मन्दिर में धोक लगा कर प्रवेश करते । बाड़ी माता का ज्योति जुलुस जोत प्रत्येक गांव में ट्रैक्टर पैदल चल कर माँ के मन्दिर को विशाल धाम बनाने के लिये प्रचार-प्रसार करने लगे ।
भक्त मण्डली का पर्दा लगाकर ज्योति के साथ अनेक धार्मिक स्थानों का भ्रमण माँ के प्रचार-प्रसार करते हुए मन्दिर निर्माण हेतु आर्थिक सहयोग भक्तों से लेकर एक भव्य मन्दिर का कार्य प्रारम्भ कर दिया। ज्योति जुलुस अपनी पत्नी, पुत्री एवं भक्त मण्डली के साथ जा कर माँ की अलख जगा कर धर्म-कर्म एवं त्याग जीवन का महत्त्व समझाकर गाँव-गाँव, घर-घर मुट्ठी, तगारी, बोरी अन्नदान एवं एक रूपया, इक्कीस रूपया और सैकड़ों रूपया लेकर इस मन्दिर निर्माण को आगे की क्रियान्विति देते रहे । माँ ने एसे एसे चमत्कार देने प्रारम्भ कर दिए कि गुरुदेव के मुख से निकला वचन खाली नहीं जाने देती थी ।
हस्त रेखा
गुरुदेव ने अपने जीवन में करोड़ो हाथो की रेखा देखकर अनुभूत, अनुभव किया कि जो जीव जैसा देखता है वैसा सोचता है और वह वैसा ही बन जाता है ‘अच्छा या बुरा” ।
गुरुदेव माँ के मन्दिर के सामने बैठ कर भक्तों द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर मा पात्ती के माध्यम से पूछते एवं हस्त रेखा का अवलोकन कर भविष्य का मार्गदर्शनकरते।