इतिहास

माँ प्राकट्य उद्गम परिचय
राजपुताना राजस्थान पृथ्वीराज चौहान की नगरी अजमेर जिले में मेवाड़ की धरती से जुड़ा खारी नदी तट पर बिजयनगर से मात्र 3 किलोमीटर ग्राम बाड़ी में सम्वत् 1514 सन् 1457 (आज से 555 वर्ष पूर्व) में दक्षिण दिशा से माँ भगवती एक भक्त बच्चे के साथ आई और कहा जहाँ मैं रूक जाऊँ वही मेरी स्थापना कर देना ।
कालान्तर में राणा लाखा एवं बादशाह मोहम्मद के समय बैशाख सुदी आखातीज सम्वत् 1521 में बावड़ी खुदाई एवं माताजी की रसोई की जिसमें मालपुआ का भोग लगाया ।
बाड़ी माता का मन्दिर अति प्राचीन मन्दिर है इस मन्दिर में नवदुर्गा विराजमान है, ऐसा माना जाता है कि पूर्व में निज मन्दिर के अन्दर एक गुफा थी और पुजारी उस गुफा में रहता था। माताजी की झालर नारेली में फूल पाती का पर्चा था जिसमे माँ के मस्तक पर रखी जाल के पेड़ की पत्तियों को बारीक करके पाती एवं फूल को माँ के मस्तिष्क पाट पर रखा जाता था भक्त गण अपनी परेशानियों का समाधान निराकरण फूल पात्ती के पर्चे से पा लेता था। यह फूल पाती का पर्चा केवल रविवार के दिन ही होता था। अब माता रोज ही फूल जाती का पर्चा देती हैं भक्तो का कष्ट व दुःख दूर करने के लिए ।
गुफा का विवरण बाड़ी ग्राम के एक बुजुर्ग श्री मिश्रीलाल जी व्यास ने बताया कि “जब मैं छोटा था तब एक बार निज मन्दिर में एक काला सर्प घुस गया। सर्प को भगाने के लिए कातले-पत्थर हटाये तो गुफा साफ-साफ नजर आई। उनका कहना सत्य है और प्रमाण के रूप में वे आज भी जिन्दा है ।
बाड़ी माता की महिमा
यह सत्य है कि बाड़ी माता मन्दिर की प्राचीन चिन्मय नवदुर्गा की मूर्ति प्रश्नकर्त्ता को हारी-बीमारी दुःख-दर्द, दोष-क्लेश, नौकरी-धन्धा, व्यापार-व्यवसाय, आदि शिक्षा-दीक्षा आदी सभी समस्याओं के समाधाना निवारण हेतु फूल पाती का पर्चा ऐसे देती है कि कोई पकड़ कर फेंकता हो ऐसे प्रत्यक्ष अनुभूति और विश्वास होता है कि माँ-प्रभु साक्षात् इस पत्थर की मूर्ति में विराजमान हो ।
क्या है फूल पाती ?
नवदुर्गाबाड़ी माता के मस्तिष्क पर जाल के पेड़ की पत्तियों को हाथ से मसल कर बारीक करके एवं फूल गुलाब, चमेली जो भी उपलब्ध होते है पत्तियों के साथ चढ़ा दिए जाते है । माँ के भक्त गण दूर-दूर से आकर अपनी समस्या हेतु झालर, नारेली (एक छोटी थाली एवं नारियल को फोड़ कर बचा हुआ कवर) को माँ के सामने रख देते है। प्रश्नकर्त्ता समस्या का समाधान फूल और पात्ती से मांगते है।
आरम्भ में यह फूल-पात्ती का पर्चा रविवार एवं नवरात्रि में ही होता था । परन्तु अब माँ भक्त उपासक गुरुदेव ( श्री चुन्नीलाल जी) के अथक उपासना एवं साधना की निरन्तरता से माँ की पाती आदेशानुसार प्रतिदिन फूल पाती का पर्चा है ।
प्रश्नकर्त्ता द्वारा अपना प्रश्न एक (पेपर) स्वरूप में लिखकर माँ के निज मन्दिर मे माँ के सामने रखा जाता है और साक्षात् बाड़ी माता उस प्रश्न को पढ़कर तुरन्त लोहे की लकीर की तरह प्रश्नकर्त्ता को पात्ती के माध्यम से उत्तर देती है।
कैसे पढ़ती है माँ प्रशनकर्ता का प्रशन?
पूर्व में झालर नारेली के माध्यम से प्रश्नकर्त्ता को उत्तर मिलता था हाँ और ना अगर उसमें पाती आ जाती तो हाँ और नही आती तो ना। परन्तु माँ के अनन्य भक्त मुख्य सेवक श्री चुन्नीलालजी टाक व उ. जिला शिक्षा अधिकारी एवं पूर्व प्राचार्य ने माँ से अपना सीधा सम्पर्क साधा और अपना प्रशन सादे कागज पर लिख कर माँ के चरणों मे रखकर तुरन्त समस्या का समाधाना माँ से फूल – पात्ती के रूप में प्राप्त किया। माँ के मस्तिष्क पर रखी फूल एवं जाल के पेड़ की पत्तियाँ प्रश्नकर्त्ता के प्रशन पर स्वतः प्रारब्धानुसार आकर गिर जाती है और पुजारी उस पर सिन्दुर से मार्क कर के प्रश्नकर्त्ता को पात्ती ला कर देता है। कभी-कभी माँ प्रश्नकर्त्ता भक्तों से इतनी प्रभावित होती है कि माँ की मालाओं से फूल उछल कर प्रश्नकर्त्ता की गोद या हाथों में आकर गिर जाता है यह कलयुग का आश्चर्य सत्य है।
श्री के. के. भार्गव व्याख्यता अंग्रेजी रा.मा.वि. विजयनगर (अजमेर) पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी जयपुर से सन् 1972 मे आए और उन्होंने माता से पात्ती लिखकर पूछा कि मेरी पत्नी श्रीमती निशा भार्गव शिक्षिका का स्थानान्तरण कब होगा। माँ ने आदेश दे कर कहा कि एक माह मे हो जायेगा 29 दिन बीत चुके थे 30 वाँ दिन का सूर्य उदय हो चुका था श्री के. के. भार्गव अति क्रोधित हो कर आवेश में आकर साइकिल से बाड़ी माता चल कर आ रहे थे कि मैं टाक साहब से यह झगड़ा करूँगा और कहूँगा कि तेरी माँ झुठी है और तू यह पाखण्ड फैला रहा है । कोई मक्खी, मच्छर, चींटी आकर फूल पात्ती गिरा देती है और वह टाक इस पर विश्वास कर एक पढ़ा लिखा राजकीय सेवा मे कॉमर्स व्याख्याता हो कर मूर्ख बन कर अपना जीवन अंधकार मे डाल रहा है। जब वे यह विचार करते हुए आ रहे थे तभी रास्ते मे सत्ताईस मिल विजयनगर चौराहे पर एक गाड़ी के. के. भार्गव के पास आकर रूकी और कहा कि साहब आपकी पत्नी का स्थानान्तरण हो गया है, और में देख कर आ रहा हूँ जो विचार उस समय उनके मानस पटल पर थे वे भाव-विभोर होकर माता के पास पहुँचे और कहा कि टाक साहब आपकी माँ साक्षात विराजमान है। मैं मान गया “चमत्कारी माँ” को ।